गर्मी में घूमने और एन्जॉय के लिए सिलवासा का करें प्लान

गर्मी में घूमने और एन्जॉय के लिए कर रहे हैं जगहों की तलाश, तो सिलवासा का करें प्लान

सिलवासा के बारे में अगर यह कहें कि बस नाम ही काफी है तो गलत नहीं हेागा। वास्तव में, सिलवासा पुर्तगाली नाम है, जिसका अर्थ ही है- वह जंगल, जिसमें कमाल का चुंबकीय आकर्षण है। आप चाहे प्रकृतिप्रेमी हों या फिर रोमांचक अनुभवों को संजोने के शौकीन अथवा इतिहासप्रेमी, सिलवासा हर किसी स्वागत करता है।

दादरा और नगर हवेली नामक दो अलग भौगोलिक क्षेत्रों के मिलने से बना है यह केंद्रशासित प्रदेश। महाराष्ट्र और गुजरात की सीमाएं लगती हैं इस शहर से। इन दो राज्यों के वीकएंड डेस्टिनेशन के तौर पर भी यह लोकप्रिय है। यहां के मूल निवासी वर्ली जनजाति हैं। इनकी बोली में गुजराती, मराठी, कोंकणी का मिश्रण दिखता है। वैसे ये आज भी खेती पर निर्भर हैं, जिनकी जीवनशैली बड़ी सरल है। इस सरल जीवन को और सरस बनाता है चित्रकला का उनका हुनर। यहां की दीवारों पर उकेरे उनके हुनर को देखकर मन खुशनुमा एहसास से भर जाता है। ताज्जुब होता है कि एक तरफ जहां लोग प्राचीन परंपरा और संस्कृति से दूर हो रहे हैं, वहीं वर्ली जनजाति के लोग इसे बचाए रखने की कवायद में जुटे हैं।

वर्ली जनजाति के लोग कला साधक होते हैं। यही वजह है कि चित्रांकन ही नहीं, बल्कि नृत्य भी उनके जीवन का अभिन्न अंग है। नृत्य के बिना मानो इनका जीवन अधूरा है। अलग-अलग समय पर ये विभिन्न प्रकार की नृत्य शैलियों के जरिए जीवन से कदमताल करते हैं। जैसे-यहां का वरोपा नृत्य फसल कटाई के समय किया जाता है। दिन के अलावा रात के समय भी महिला व पुरुष दोनों मिलकर यह नृत्य करते हैं। फसल कटाई के समय ही ढोल नृत्य को देखना कमाल का अनुभव हो सकता है।

सिलवासा शहर पुर्तगालियों की यादों को बड़ी खूबसूरती से समेटे हुए है। शहर घूमते हुए आप इन यादों से कहीं भी टकरा सकते हैं। जैसे यहां के रोमन कैथोलिक चर्च जाकर देखें, जहां आगंतुकों की भीड़ लगी रहती है। खास तौर पर इसकी वास्तुकला दर्शनीय है।’द चर्च ऑफ अवर लेडी पिटी’ नामक यह चर्च शहर के बीचो-बीच स्थित है। इसे साल 1897 में तैयार कराया गया था। चर्च के भीतर लकड़ी के तख्तों पर सुंदर चित्रकारी की गई है। हां, यदि आप पुर्तगाली संस्कृति को और करीब से देखना चाहते हैं तो पुरानी पुर्तगाली कॉलोनी चले जाएं। यहां से बहुत सारी खुशनुमा यादें साथ ले जा सकते हैं।

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