देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है अम्बाजी मंदिर, जहां नहीं है मां की कोई मूरत

देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है अम्बाजी मंदिर, जहां नहीं है मां की कोई मूरत

इस मंदिर का जीर्णोद्धार 1975 में शुरू हुआ था, जो अब तक जारी है। सफेद संगमरमर से बना यह भव्य मंदिर पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। इसका शिखर 103 फुट ऊंचा है और उस पर 358 स्वर्ण कलश सुसज्जित हैं। मंदिर से लगभग 3 किमी. की दूरी पर गब्बर नामक एक पहाड़ भी है, जहां देवी का एक और प्राचीन मंदिर स्थापित है। ऐसा माना जाता है कि इसी पत्थर पर यहां मां के पदचिह्न एवं रथचिह्र बने हैं। अंबा जी के दर्शन के बाद, श्रद्धालु गब्बर पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर में ज़रूर जाते हैं। हर साल भाद्रपदी पूर्णिमा पर यहां मेले जैसा उत्सव होता है। नवरात्र के अवसर पर मंदिर में गरबा और भवाई जैसे पारंपरिक नृत्यों का आयोजन किया जाता है।

शक्तिस्वरूपा अम्बाजी देश के बहुत ही पुराने 51 शक्तिपीठों में से एक है। जहां मां सती का हृदय गिरा था। मंदिर तक पहुंचने के लिए 999 चीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। इस मंदिर में अम्बा की पूजा श्रीयंत्र की अराधना से होती है जिसे सीधे आंखों में देख पाना मुमकिन नहीं। नवरात्रि में यहां नौ दिनों तक चलने वाला पर्व बहुत ही खास होता है। जिसमें गरबा करके खास तरह से पूजा-पाठ किया जाता है।

माउंट आबू में ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय का हेड क्वार्टर भी है। यहां दिलबाड़ा नामक स्थल में स्थित जैन मंदिर भी दर्शनीय है। यहां एक ही स्थान पर पांच मंदिर बनाए गए हैं। जैन समुदाय के इस मंदिर के कारण, माउंट आबू को विशेष प्रसिद्धि मिली है। इसे दिलबाड़ा जैन मंदिर कहा जाता है। यहां एक ही स्थान पर पांच मंदिर बनाए गए है, जिनमें बारीक नक्काशी व पच्चीकारी का ऐसा बारीक काम किया गया है, जिसे देखकर पर्यटक आश्चर्यचकित रह जाते हैं। अपनी वास्तुकला के लिए यह मंदिर विश्व प्रसिद्ध है। माउंटआबू की सबसे ऊंची चोटी को गुरु शिखर कहा जाता है। यह राजस्थान का मशहूर हिल स्टेशन है। यहां गर्मियों में अक्सर लोग सैर-सपाटे के लिए आते हैं। नक्की झील, सनसेट पॉइंट, टॉडरॉक (मेढक की आकृति वाला चट्टान), अचलेश्वर महादेव मंदिर, गुरु वशिष्ठ जी का आश्रम आदि यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। माउंट आबू अपने मनोहारी प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी प्रसिद्ध है।

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