सिर्फ अमीरों के घरों में पाया जाता था यह खास मसाला

सिर्फ अमीरों के घरों में पाया जाता था यह खास मसाला, यूरोप के लिए था रहस्यमय

हजारों सालों से रहा है। 2000 ईसा पूर्व में इसके मिस्त्र में इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि यह दालचीनी चीन में होती थी और मिस्त्र जाती थी। तब इसका इस्तेमाल लेपन के काम में सुंगध के लिए होता था। यहां तक कि इसके बारे में बाइबल के ओल्ड टेस्टामेंट में आवश्यक तेल के रूप में हुआ है। माना जाता है कि दालचीनी की पैदावार प्राचीन समय में केवल दक्षिण भारत और श्रीलंका में होता था। यहीं से अरब सौदागर इसे भर-भरकर यूरोप लेकर जाते थे। यह भी कहा जाता है कि जब रोमन सम्राट नीरो की दूसरी बीवी पोपाए सबीना का 65 ईस्वीं में देहांत हुआ तो उसने अंतिम संस्कार में अधिकतम दालचीनी जलाया।

अरब सौदागर यूरोप तक दालचीनी ले जाने के लिए जिस रास्ते का इस्तेमाल करते थे, उसमें वह सीमित मात्रा में इसे लेकर जा सकते थे, इसके चलते यह न केवल यूरोप में बहुत महंगी बिकती थी, बल्कि स्टेटस सिंबल भी बन गई। जब कोई मध्यवर्ग का शख्स तरक्की करके ऊपर के स्तर पर पहुंचता था, वहां वह अपने स्टेटस का प्रदर्शन करने के लिए दालचीनी जरूर खरीदता था। उस समय दालचीनी का इस्तेमाल खास लोगों द्वारा होता था। यह जाड़े के दिनों में मीट के प्रिजर्वेटिव के रूप में होता था। यूरोप में हालांकि इसका इस्तेमाल अच्छा खासा होने लगा था।

अरब सौदागर दालचीनी को लेकर ऐसी कहानियां गढते थे कि किसी को पता ही नहीं लगे कि वास्तव में वह इसे कहां से लेकर गए थे। इसी को लेकर एक कहानी का जिक्र ग्रीक इतिहासकर हेरडोटस ने ईसा से पांच सौ साल पहले किया। अरब सौदागर कहते थे कि ऊंचे पहाड़ों पर रहने वाले कुछ असाधारण पक्षी इसे अपने घोंसले में लाते हैं। ये पर्वतों पर इतनी ऊंचाई पर होते हैं कि वहां पर पहुंचना मुश्किल होता है, इसलिए लोग नीचे बैल का मीट रख देते हैं, जब पक्षी इसे लेकर अपने घोंसले में पहुंचते हैं, तो मीट के वजन से घोंसला टूटकर नीचे आ गिरता है, तब इन दालचीनी की लकडि़यों को बटोर लेते हैं। कुछ कहानियां ऐसी होती हैं कि यह एक ऐसे जंगल में पाए जाते हैं, जहां सांप इसकी रखवाली करते हैं। ये सब कहानियां 16वीं सदी तक चलती रहीं यानी अरब सौदागर इनके स्त्रोत की छिपाने में तब तक सफल रहे, लेकिन इसके बाद जब यूरोप के जहाजियों का बेड़ा भारत और श्रीलंका की ओर पहुंचा, तो यह राज सबको पता लग गया कि दालचीनी दरअसल कहां होती है। क्रिस्टोफर कोलंबस जिस उद्देश्य से भारत आना चाहता था, उसमें एक वजह दालचीनी और कालीमिर्च भी थी।

क्या हैं फायदे

  1. पाचन में सुधार लाने के लिए इसका अलग तरीकों से उपयोग किया जाता है। दालचीनी से जी मचलना, उल्टी और जुलाब रुकते हैं। कब्ज और गैस की समस्या कम करने के लिए दालचीनी के पत्तों का चूर्ण और काढा बना कर लिया जाता है।
  2. चुटकी भर दालचीनी पाउडर पानी में उबालकर, उसमें चुटकी भर काली मिर्च पाउडर और शहद डालकर लेने से सर्दी-जुकाम, गले की सुजन एवं मलेरिया कम हो जाता है।
  3. स्त्री रोगों में इसका उपयोग होता है। प्रसव के बाद एक महीने तक दालचीनी का टुकड़ा चबाने से गर्भ धारण को टाला जा सकता है। दालचीनी से माता के स्तन का दूध बढ़ता है।

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