भारत के आखिरी गांव का खूबसूरत और यादगार सफर

भारत के आखिरी गांव का खूबसूरत और यादगार सफर

नारकंडा और याक
शिमला के आगे नारकंडा पहुंचने पर रंगबिरंगी घंटियों और रिबन से सजे याक दिखने लगे। पहली बार याक देखने का रोमांच इतना था कि रुक कर तस्वीरें खिंचवाने का मजा ले लिया। यहां से हिमालय के नजारे दिख रहे थे। आगे रास्ता लंबा था इसलिए ज़्यादा देर नहीं रुके। रास्ते में करछम डैम था, जहां चारों ओर निर्माण कार्य चल रहा था। करछम से आगे सांगला वैली का रास्ता खौफनाक है और इसका नाम दुनिया के सबसे खतरनाक रास्तों में शुमार है। एक तरफ बसपा नदी और दूसरी तरफ बीहड़ पहाड़। कहीं-कहीं तो सड़क इतनी खराब है कि लगता है यहां से गाड़ी पार कैसे होगी। पहाड़ के बीचों बीच यूं काट कर रास्ता बना है कि गाड़ी किसी तरह निकलती है। इससे बचे तो भड़भड़ाते पत्थरों की बरसात शुरू। खाई की तरफ देखने पर डर के आगे जीत को भूल हनुमान चालीसा याद आती है।

खूबसूरत घाटी
सुबह की रोशनी में सांगला घाटी को जब देखा तो सारी थकान और परेशानी यूं गायब हो गई। एक तरफ बसपा नदी, बर्फीले पहाड़ तो दूसरी ओर दूर तक फैला जंगल। प्रकृति का ऐसा मनोरम स्वरूप कि सब कुछ भूल कर बस निहारते रहने को मन करता है। यहां फलों के पेड़ भी काफी संख्या में दिखाई देते हैं जैसे सेब, एप्रिकॉट, स्ट्रॉबेरी आदि। आबादी कम होने की वजह से शांति इतनी है कि प्रकृति को करीब से महसूस कर सकते हैं। सब कुछ भूल, प्रकृति के साथ एकाकार होने की जगह है यह। यह ऑफ बीट टूरिस्ट डेस्टिनेशन है इसलिए बहुत टूरिस्ट्स यहां नहीं आते। यह जगह उनके लिए है, जो रोमांच प्रिय हैं और हिमालय से प्यार करते हैं।

स्थानीय खाना
यहां के सीधे-साधे, छोटी आंखों वाले हिमाचली लोग दाल, रोटी, सब्‍जी तो खाते हैं पर तिब्बती प्रभाव की वजह से थुकपा, मोमो, नूडल्स भी जगह-जगह आसानी से मिल जाएगा। स्थानीय बाजार में किन्नौरी सेब, एप्रिकॉट दिखते हैं। जिस होटल में हम रुके थे, वहां स्ट्रॉबेरी का बाग था, इसलिए जी भर कर स्ट्रॉबेरी का स्वाद लिया। ताजे रसीले फलों का हिमालय की वादियों में अलग स्वाद है।

छितकुल गांव
सांगला वैली से 24 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस गांव के बारे में काफी सुना था कि भारतीय सीमा का यह आखिरी गांव किसी मनमोहक पेंटिंग सा दिखता है। मन में ढेरों कौतूहल लिए अगले दिन सुबह ही हम वहां निकल पड़े। पहाड़ों में या किसी भी जगह यात्रा करने से पहले यह बात समझनी जरूरी है कि गंतव्य पर पहुंचने पर ध्यान केेंद्रित करने के बजाय रास्ते का मजा लेना चाहिए। जिस रास्ते से हम छितकुल गांव जा रहे थे, उस रास्ते की पल-प्रतिपल की खूबसूरती को कई प्रोफेशनल फोटोग्राफर अपने कैमरे में कैद कर रहे थे। पहाड़ों का रंग कहीं भूरा, कहीं सलेटी तो कहीं गहरा काला और थोड़ी ही दूर पर सफेद बर्फीली चोटियां। कहीं सड़क पर प्यार से उमड़ आई नदी की धारा, दूर तक बिखरे चिकने-चमकीले पत्थर, पेड़ों के झुरमुट से झांकती, मुसकराती सूरज की हंसी। स्कूल जाते बच्चों की चहक, कहीं भेड़-बकरियों के रेवड़ तो कहीं इतनी खूबसूरत छवि को देख खुद को कैमरे में कैद करने को बौराए लोग।

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