गर्मी से राहत पाने के साथ ही कुछ नए और अनोखे एक्सपीरियंस के लिए लाहौल-स्पीति का करें प्लान

10वीं सदी का त्रिलोकीनाथ मंदिर
यह मंदिर 10वीं शताब्दी में बनाया गया था। 2002 में मंदिर परिसर में पाए गए शिलालेख से इसका खुलासा हुआ था। जिला मुख्यालय केलंग से लगभग 45 किलोमीटर की दूरी पर है। त्रिलोकीनाथ मंदिर का प्राचीन नाम टुंडा विहार है। शिलालेख में इसका वर्णन किया गया है कि यह मंदिर दवनज राणा ने बनाया था, जो त्रिलोकीनाथ गांव के राणा ठाकुर शासकों के पूर्वजों के प्रिय हैं। उनकी मदद चंबा के राजा शैल वर्मन ने की थी। हिंदू व बौद्ध परंपराओं के अनुसार इस मंदिर में पूजा की जाती रही है।

नीलकंठ झील
यहां महिलाएं नहीं जातीं! यह झील पटन घाटी के नैनगार में स्थित है। नीलकंठ महादेव नाम के अनुरूप ही यह नीले रंग की छोटी-सी झील है। नीलकंठ झील 4500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां दूर-दूर से सैलानी ट्रैकिंग के लिए आते हैं। नैनगार से यहां के लिए लगभग 12 किमी. पैदल सफर करना पड़ता है। इस झील से जुड़ा एक रोचक पक्ष यह है कि इसका दर्शन केवल पुरुष ही कर सकते हैं। महिलाओं को यहां आने की अनुमति नहीं है। महिलाओं को जाने की अनुमति क्यों नहीं है, इसको लेकर सही जानकारी किसी के पास नहीं है।

चंद्रताल देखना न भूलें
स्पीति घाटी में 14,100 फीट की ऊंचाई पर स्थित ऐतिहासिक चंद्रताल झील का अपना ही महत्व है। अगर आप मनाली से स्पीति जा रहे हों तो कुंजुम से पहले बातल के बाद सीधा संपर्क मार्ग से चंद्रताल का रुख कर सकते हैं। कुंजुम पहाड़ी के साथ सटी चंद्रताल झील अपने आप में अजूबा है। इसी झील से चंद्रा नदी का उदय होता है, जो आगे चलकर चिनाब नदी बनती है। झील का घेरा लगभग तीन किलोमीटर है। यहां आने के लिए जून 15 से अक्टूबर के प्रथम सप्ताह तक बेहतर समय माना जाता है।

आराध्य देव राजा घेपन मंदिर
लाहुल-स्पीति के राजा माने जाने वाले राजा घेपन का यह मंदिर मनाली-केलंग मार्ग में सिस्सू में स्थित है। केलंग जाने वाला हर पर्यटक यहां रुककर देवता के दर्शन करता है। देश-विदेश के सैलानी भी यहां सुख-समृद्धि की कामना से माथा टेकते है। मान्यता है कि हर तीसरे साल देवता राजा घेपन लाहुल घाटी की परिक्रमा पर निकलते हैं और ग्रामीणों को आशीर्वाद देते हैं।
ताबो मठ भी है खास

समुद्र तल से 3050 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ताबो मठ काजा से 40 किमी. दूरकाजा-किन्नौर मार्ग पर स्थित है। यह मठ हिमालय क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण मठ माना जाता है। इसका निर्माण 996 ई. में हुआ था।

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