सिंपल खाएं या रबड़ी के साथ, इस जलेबी का स्वाद लंबे अर्से तक रह जाएगा याद

सिंपल खाएं या रबड़ी के साथ, इस जलेबी का स्वाद लंबे अर्से तक रह जाएगा याद

स्वाद का सीक्रेट
बहुत पुराना है स्वाद का यह ठिकाना…ऊपर बोर्ड लगा है ओल्ड फेमस जलेबी वाला और स्थापना वर्ष है 1884, पिछली चार पीढ़ियों से यह जगह और यह स्वाद कायम है। बड़े कड़ाहे में छनती बड़ी-बड़ी जलेबियां और बगल में एक कड़ाही में तले जाते समोसे, एक तरफ रखी रबड़ी, चारों ओर फैली घी की खुशबू। खुशबू और स्वाद की खास वजह है शुद्ध देसी घी और देसी खांडसारी चीनी।

ऐसे हुई स्थापना
जलेबी की इस दुकान की स्थापना की थी स्व. लाला नेम चंद जैन ने। बताया जाता है कि वो आगरा से 1884 में मात्र 2 रूपए लेकर दिल्ली आ गए थे। इसी पैसे से उन्होंने अपना छोटा सा कारोबार शुरू किया और आज यहां तक पहुंच गए। जलेबी का यह स्वाद पाने तक उन्होंने कई तरीके आजमाए, इंग्रेडिएंट्स में बदलाव किया, तब जाकर यह स्वाद मिला, जो आज लोगों की जुबान पर चढ़ कर बोल रहा है। आज यह तो नहीं है लेकिन उनकी भावी पीढ़ियां स्वाद की इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।

चर्चे इनके दूर-दूर तक
इन जलेबियों का स्वाद दिल्ली तक ही सीमित नहीं है। चौथी पीढ़ी तक पहुंचते-पहुंचते यह देश के कई हिस्सों तक पहुंच चुका है। लोग इन्हें शादी-ब्याह के ऑर्डर देते हैं। दिल्ली घूमने वाले भी यहां आते हैं। देश के बाहर भी यूएस, यूके, पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया और केनेडा तक इस स्वाद की धमक पहुंची है। मशहूर राजनीतिज्ञों से लेकर फिल्म स्टॉर्स तक इन जलेबियों का स्वाद लेने लाल किले के पास बनी इस दुकान तक पहुंचते हैं। स्वाद का यह ठिकाना राजनैतिक मतभेदों और धार्मिक मतभेदों से दूर है। हर वर्ग, जाति, धर्म और राजनीतिक दल के लोग इस स्वाद के मुरीद हैं।

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