Jagannath Rath Yatra 2019: ओडिशा में इन 2 गांवों को देखने आते हैं दुनिया भर से दर्शक, जानें क्यों हैं खास

Jagannath Rath Yatra 2019: ओडिशा में इन 2 गांवों को देखने आते हैं दुनिया भर से दर्शक, जानें क्यों हैं खास

कृष्ण की नगरी पुरी घूमते हुए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा के अपने मौसी के घर जाने की भव्य यात्रा के महत्व के बारे में सुनते हुए दो गांवों की बहुत चर्चा सुनी थी। इसमें से एक का नाम है रघुराजपुर और दूसरा पीपली। दोनों गांव उत्कृष्ट कलात्मक वस्तुओं और उन्हें बनाने वालों कलाकारों के लिए जाने जाते हैं। रघुराजपुर में पटचित्रों का काम होता है और पीपली में चांदुआं और एपलिक वर्क का काम। सबसे अच्छी बात यह कि दोनों गांव भुवनेश्र्वर जाने के रास्ते में ही आते हैं। ऐसे में वहां जाने की इच्छा में कोई अड़चन भी नहीं होती। पुरी के सुमद्री किनारों से विदा लेते हुए वापस भुवनेश्र्वर एयरपोर्ट की ओर सुबह-सुबह यात्रा शुरू की।

रघुराजपुर गांव: पुरी से करीब 14 किमी. पर चंदनपुर गांव है। वहां से दो लेन की सड़क रघुराजपुर की तरफ मुड़ती है, जो यहां से तकरीबन डेढ़ किमी. की दूरी पर है। सड़क के दोनों ओर लगे सुपारी और नारियल के पेड़ों को पीछे छोड़ते हुए हम पांच मिनट में रघुराजपुर गांव पहुंच गए। गांव के बाहर सफेद रंग के दो स्वागत द्वार हैं, जिसके बीच में ही रामचंद्र जी का मंदिर है। हम वहां सुबह दस बजे पहुंचे। गांव में काफी चहलपहल दिख रही थी, शायद किसी समारोह की तैयारी चल रही थी। दो-तीन गाडि़यों के काफिले को देख गांव वाले आगंतुकों के स्वागत के लिए आगे बढ़े। उनके पीछे कुछ और कलाकार भी अपने घरों से निकलकर हमारी तरफ लपके। वे हमें गांव दिखाने और अपनी कलाकारी के बारे में बताने लगे। गांव ज्यादा बड़ा नहीं है। मेरे ख्याल से यहां तकरीबन डेढ़ सौ घर हैं और दो ही गली है। निगाहें गांव के घरों की दीवारें पर ठहरती हैं, जहां महीन कूचों की कलाकारी की मनमोहक तस्वीरें पौराणिक कथा सुनाती प्रतीत होती हैं। किसी दीवार पर शेषनाग पर बैठे कृष्णलीला का दृश्य है, कहीं गोपियों संग नृत्य करते कृष्ण दिखाई देते हैं, तो कहीं सफेद रंग से ही फूल-पत्ती और सुंदर जानवरों के चित्र उकेरे गए हैं। घर की छतों पर सोलर पैनल भी लगे हैं, जो हम सभी को सीख भी देते हैं। गांव की गली अंदर की तरफ ऊंची होती जाती है। यहां के हर घर का पहला कमरा नुमाइश के लिए खासतौर पर तैयार किया जाता है, इसलिए कमरों की खिड़कियों व किवाड़ों से पटचित्रों और छतों से लटकाई गई खूबसूरत आकर्षक वस्तुओं की झलक मिलती रहती है। करीब पचास घरों के बाद गली दूसरी ओर मुड़ जाती है। यहां गली में कुछ बुजुर्ग महिलाएं बाहर चौखट पर बैठी पर्यटकों को निहारती नजर आती हैं। इनमें से एक बुजुर्ग दादी आशी बताती हैं कि यह गांव सदियों से पटचित्र बनाने का काम करता रहा है। सुंदर पटचित्र बनाने में पूरा परिवार जुटता है। कुछ लोग यहां के लोकनृत्य गोतिपुआ में भी माहिर हैं। ओडिसी के मशहूर नर्तक केलुचरण महापात्र इसी गांव से हैं।

पीपली गांव: हमारा दूसरा पड़ाव पीपली गांव था, जहां एपलिक (कपड़ों को हाथों से सिलकर उस पर डिजाइनिंग और शीशे लगाने का पारंपरिक काम) और चांदुआ (झूमर, छोटे टेंट) का काम होता है। रघुराजपुर से करीब 30 किमी. आगे ही पीपली है। मुख्य सड़क से ही रंग-बिरंगी वॉल हैंगिंग, पर्स, थैले, छतरी, झूमर, चांदुआ की दुकानें शुरू हो जाती हैं।

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