धार्मिक और रहस्य-रोमांच का अनोखा तालमेल है चार धामों में से एक ‘यमुनोत्री’ की यात्रा

धार्मिक और रहस्य-रोमांच का अनोखा तालमेल है चार धामों में से एक 'यमुनोत्री' की यात्रा

उत्तराखंड हिमालय में स्थित विश्र्व प्रसिद्ध चारधाम की यात्रा इस बार सात मई से शुरू हो रही है। अक्षय तृतीया पर इसी दिन यमुनोत्री व गंगोत्री धाम के कपाट ग्रीष्मकाल के लिए खोले जाने हैं, जबकि 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल केदारनाथ धाम के कपाट नौ मई और भू-वैकुंठ बदरीनाथ धाम के कपाट 10 मई को खोले जाएंगे। समुद्रतल से 4000 मीटर तक की ऊंचाई पर होने वाली यह यात्रा धर्म-अध्यात्म ही नहीं, रहस्य-रोमांच की यात्रा भी है। यह यात्रा तन-मन को शांति, सुकून व शीतलता तो प्रदान करती ही है, उत्तराखंडी लोक परंपराओं के दर्शन भी कराती है।

हिमालय की चारधाम यात्रा धर्मनगरी हरिद्वार और तीर्थनगरी ऋषिकेश से शुरू होती है, लेकिन शास्त्रों में इसकी शुरुआत यमुनोत्री धाम से मानी गई है। देवी यमुना भक्ति की अधिष्ठात्री हैं। ‘स्कंद पुराण’ के ‘केदारखंड’ में कहा गया है कि भक्ति के बिना ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं। इसलिए यमुनोत्री के बाद ही गंगोत्री धाम की यात्रा करनी चाहिए, क्योंकि देवी गंगा ही ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं। ज्ञान इंसान को वैराग्य यानी बाबा केदार की शरण में ले जाता है। यही वह स्थिति है, जब जीवन में कुछ भी पाने की चाह शेष नहीं रह जाती। शास्त्रों में कहा गया है कि यही निर्विकार भाव जीव को भगवान बदरी विशाल की शरण में ले जाता है। यहां आनंद ही आनंद है। इसीलिए बदरीनाथ धाम को पृथ्वी पर वैकुंठ यानी भू-वैकुंठ की उपमा दी गई है। हालांकि यह कोई शास्त्रीय बंधन नहीं है और आप अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी धाम की यात्रा कर सकते हैं।

उत्तरकाशी जिले में स्थित यमुनोत्री धाम को चारधाम यात्रा का प्रथम पड़ाव माना गया है। यहां सूर्यपुत्री और शनि व यम की बहन देवी यमुना की आराधना होती है। समुद्रतल से 3235 मीटर (10610 फीट) की ऊंचाई पर स्थित यमुनोत्री धाम से एक किमी. की दूरी पर चंपासर ग्लेशियर है, जो यमुनाजी का मूल उद्गम है। समुद्रतल से इस ग्लेशियर की ऊंचाई 4421 मीटर है। धर्मग्रंथों में उल्लेख है कि यह पवित्र स्थान एक साधु असित मुनि का निवास स्थल था। उन्होंने यहां देवी यमुना की आराधना की, जिससे प्रसन्न हो यमुनाजी ने उन्हें दर्शन दिए। यमुनोत्री धाम पहुंचने के लिए जानकीचट्टी से छह किमी. की खड़ी चढ़ाई पैदल तय करनी पड़ती है। यहां पर स्थित यमुना मंदिर का निर्माण जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं सदी में करवाया था।

ऋषिकेश से शुरू होने वाली यमुनोत्री यात्रा के मार्ग में भी कई तीर्थ पड़ते हैं। खासकर गंगनानी में प्रयाग से पूर्व होने वाले गंगा व यमुना की धाराओं के संगम, ऋषि जमदाग्नि मंदिर, हर्षिल में हरि शिला, हनुमानचट्टी में हनुमान मंदिर और यमुनोत्री के शीतकालीन पड़ाव खरसाली में यमुना मंदिर के दर्शनों का लाभ आप प्राप्त कर सकते हैं।

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